- 1- پیشگفتار 1
- 2- هدف از تدوین 3
- 3- یادآوری چند نکته 3
- 6- نکات 31 تا 45 29
- 7- نکات 46 تا 60 41
- 8- نکات 61 تا 75 52
- 9- نکات 76 تا 90 63
- 10- نکات 91 تا 105 76
- 11- نکات 106 تا 120 91
- 12- نکات 121 تا 135 105
- 13- نکات 136 تا 150 117
- 14- نکات 151 تا 165 130
- 16- نکات 181 تا 195 156
- 17- نکات 196 تا 210 165
- 18- نکات 211 تا 225 175
- 20- نکات 241 تا 255 195
- 21- نکات 256 تا 270 210
- 22- نکات 271 تا 285 222
- 23- نکات 286 تا 300 233
- 24- نکات 301 تا 315 243
- 25- نکات 316 تا 330 249
- 26- نکات 331 تا 345 262
- 27- نکات 346 تا 360 272
- 28- نکات 361 تا 375 285
- 29- نکات 376 تا 390 297
- 31- نکات 406 تا 420 321
- 32- نکات 421 تا 435 330
- 33- نکات 436 تا 450 342
- 34- نکات 451 تا 465 353
- 35- نکات 466 تا 480 356
- 37- نکات 496 تا 510 375
- 38- نکات 511 تا 525 384
- 39- نکات 526 تا 540 389
- 40- نکات 541 تا 555 402
- 41- نکات 556 تا 570 412
- 42- نکات 571 تا 585 422
- 43- نکات 586 تا 600 431
- 44- نکات 601 تا 615 443
- 45- نکات 616 تا 630 453
- 46- نکات 631 تا 645 465
- 47- نکات 646 تا 660 474
- 48- نکات 661 تا 675 485
- 49- نکات 676 تا 690 497
- 50- نکات 691 تا 705 510
- 51- نکات 706 تا 720 523
- 52- نکات 721 تا 735 534
- 53- نکات 736 تا 750 546
- 54- نکات 751 تا 765 560
- 55- نکات 766 تا 780 572
- 56- نکات 781 تا 795 583
- 57- نکات 796 تا 810 591
- 58- نکات 811 تا 825 605
- 59- نکات 826 تا 840 618
- 60- نکات 841 تا 855 631
- 62- نکات 871 تا 885 653
- 63- نکات 886 تا 900 662
- 64- نکات 901 تا 915 671
- 65- نکات 916 تا 930 683
- 66- نکات 931 تا 945 693
- 67- نکات 946 تا 960 700
- 68- نکات 961 تا 975 707
- 69- نکات 976 تا 990 717
- 70- نکات 991 تا 1005 729
1- 1895) اعراف / 23.
2- 1896) نوح / 28.
3- 1897) ابراهیم / 41.
4- 1898) قصص / 16.
5- 1899) مائده / 114.
6- 1900) مؤمنون / 97.
630 - دعا در مسجد
از این که جمله ی «و ادعوا مخلصین» بعد از جمله ی «أقیموا وجوهکم عند کلّ مسجد» آمده، روشن می شود که خداوند انسان ها را ترغیب و تشویق به دعا کردن در مسجد می کند؛ یعنی دعا در صورت اخلاص، در مسجد به اجابت نزدیک تراست.(1)
46- نکات 631 تا 645
هزار و یک نکته از قرآن کریم » نکات 631 تا 645
631 - ناله به سوی خداوند
خداوند هم از ناله و شکوه ی حضرت ایوب گفت و هم او را صابر معرفی کرد. ناله و شکوه ی ایوب علیه السلام؛ «و أیوب إذ نادی ربّه أنّی مسّنی الضّر»،(2)با این ناله و شکوه، او را صابر خواند؛ «إنّا وجدناه صابراً نعم العبد إنّه أوّاب».(3)
بنا بر این روشن می شود که این ناله و شکوه به سوی خداوند است، نه به سوی خلق. پس شکوه به خدا با صبر ناسازگار نیست. حضرت ایوب نگفت: «یا أیّها النّاس مسّنی الضّر»، بلکه گفت: «ربّ إنّی مسّنی الضّر».(4)
632 - سبب سازی و سبب سوزی
«قلنا یا نار کونی برداً و سلاماً علی إبراهیم * و أرادوا به کیداً فجعلناهم الأخسرین».(5)
گاهی می شود انسان در عالم اسباب چنان غرق می شود که خیال می کند این آثار و