- استدراک 1
- کتاب التجاره من المجلد الاول 3
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- 61 - سوال: 70
- کتاب التجاره من المجلد الثانی 72
- 62 - سوال: 72
- جواب: بدان که: چون لفظ قبض در کلمات الهی و معصومین (علیه السلام) در احکام شرعیه وارد شده (در بعض جاها به عنوان شرط صحت یا لزوم، مثل رهن و هبه. و در بعض دیگرت 72
- اشاره 72
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1- یعنی: تصرفات ایشان را در اراضی خراجیه و بیت المال ممضی داشته اند تا شیعیان بتوانند سهم خویش را بگیرند و یا با آنان معامله کنند.
2- نظر به اینکه مرحوم میرزا (قدس سره) در این مسئله لفظ " عظیم " را تکرار فرموده است لازم دانستم خوانندگان محترم را در جریان تاریخی این مسئله در طول تاریخ فقه شیعه قرار دهم. هم از دیدگاه سیرهء عملی فقها و هم از نظر فتواهای آنان: الف: سیرهء عملی: اولین حکومت شیعی در عصر فقها، دولت نسبتا مستعجل " صفاریان " - 290، 254 ها ق - است که اطلاع مشخصی از چگونگی بر خورد فقها، با آنان در دست نیست. دومین حکومت شیعی در دولت " بنی حمدان " - 369، 281 ها ق - است که با همت حمدان بن حمدون در موصل تشکیل گردید و توسط ابو الهیجاء عبد الله بن حمدون، حسن ناصر الدوله، علی سیف الدوله، سعد الدوله تداوم پیدا کرد دانشمندان شیعه و سنی و حتی مسیحی بسیار در زیر حمایت و تشویق این خاندان پرورش یافتند و آثار فراوان علمی در رشته های مختلف از این نهضت فرهنگی به جای مانده. محدثین و فقهای شیعی از حمایت های سیاسی - اجتماعی این خاندان بر خوردار بودند لیکن از بر خورد فقهی فقهاء، با آنان اطلاع روشنی در دست نیست. ولی از نظر سیره و رفتار، همه علمای شیعه میانه خوبی با آنان داشتند. خلفای فاطمی مصر: خلافت فاطمی از 297 تا 567 در مصر تداوم داشت با اینکه شیعه اسماعیلی و هفت امامی بودند مرحوم سید رضی بر وجود آنها میبالد: احمل الضیم فی بلاد الا عادی - و بمصر الخلیفه العلوی من ابوه ابی و مولاه مولای - اذا ضامنی البعید القصی لف عرقی بعرقه سید الناس - جمیعا محمد و علی معروف است که وی هر گونه هبه و هدیه ای از جانب خلفای عباسی (جایر مخالف) را رد میکرد و خلفا فاطمی را به رخ آنان میکشید. دیلمیان: در عضو دیلمیان حوزه درس شیخ مفید در بغداد به رواج کامل رسید و شخصیت هائی مانند سید رضی و سید مرتضی و شیخ طوسی در مکتب او پرورش یافتند با اینکه عضد الدوله پدر سید رضی و سید مرتضی را در قلعه ای در فارس زندانی کرده بود باز سخن و کلامی که حاکی از تضعیف دولت آل بویه باشد از فقهای یاد شده در دست نیست. و بی تردید همه آنان از کمک های مالی آل بویه بر خوردار بودند. بطوری که به محض اینکه قدرت دیلمیان در بغداد با افول مواجه می شود کتابخانه مکتب مفید را آتش میزنند و شیخ طوسی بناچار به نجف اشرف منتقل می شود سلطان محمد خدا بنده مغول: علامه حلی در دربار وی حاضر میشد و حوزه علمیه حله، از کمک های مالی او استفاده میکرد. سر به داران: مرحوم شهید اول نه تنها حکومت آنان را تجویز و تایید میکرد بل بوسیله کتاب " لمعه " که صرفا برای آنان نوشت، حکومت شان را تثبیت کرد و در حقیقت جان خود را نیز در راه این نهضت شیعی گذاشت. لمعه را در زندان و در عرض هفت شبانه روز نوشت و به سر به داران فرستاد. صفویه: با ظهور دولت صفویه، شهید ثانی در لبنان دستگیر شد و به شهادت رسید، بررسی تحقیق نشان میدهد که شهادت او ارتباطی با دولت جوان صفوی داشته است مانند شهادت شهید اول که در ارتباط با دولت سر به داران بود دولت صفوی در 906 ها ق تاسیس شده و شهید ثانی در 911 ها ق شهید شده است. محقق کرکی حکومت شاه طهماسب را رسما و با سند کتبی تنفیذ نمود. رضی الدین ابن جامع الحارثی الهمدانی العاملی النجفی با آن مقام علمی بالا، سمت قضاوت را در حکومت شاه عباس، داوطلبانه پذیرفت. علمای عصر صفوی از قبیل میر داماد، شیخ بهائی، و پدرش، علامه مجلسی و پدرش، شیخ حر عاملی و... و... همگی عملا با دولت همکاری میکردند. ب: از نظر فتوی: علمای متقدم در این مسئله معمولا به شکل " مطلق " فتوی داده اند و فرقی میان " جایر مخالف " و " جایر از شیعه " قائل نشده اند. مانند: شیخ در باب مکاسب از کتاب نهایه می گوید: و لا باس بشراء الاطعمه و سایر الحبوبات و الغلات علی اختلاف اجناسها من سلاطین الجور و ان علم من احوالهم انهم یاخذون مالا یستحقون و یغصبون ما لیس لهم ما لم یعلم شیئا من ذلک بعینه غصبا. و همچنین محقق در " شرایع " و علامه در " منتهی " و " قواعد ". و شهید در " حاشیه قواعد " و نیز در " شرح ارشاد ". و نیز در " دروس ". و فاضل مقداد در " تنقیح شرح نافع ". و سایرین مانند شیخ بطور مطلق و بدون تفصیل میان مخالف و شیعی، سخن گفته اند. گویا اولین شخصی که به این موضوع اشاره کرده شهید ثانی است که میرزا در مسائل گذشته جملهء " و کذالجایر منا " را از وی نقل کرد با اینکه در این جمله هر دو جایر مشمول یک حکم شده اند لیکن طرح مسئله راه را برای باصطلاح " ان قلت " باز کرده است. در حالی که خود شهید ثانی در موارد دیگر درست مانند فقهای نامبرده فوق، کلام را به طور مطلق آورده است. در مکاسب محرمهء شرح لمعه می گوید (و معونه الظالمین بالظلم کالکتابه لهم و احضار المظلوم و نحوه لا معونتهم بالاعمال المحلله کالخیاطه و ان کره التکسب بماله " و در مورد غنیمه در عصر غیبت می گوید "... لکونه مغنوما بغیر اذنه الا انهم علیهم السلام اذنوا لنا فی تملکه کذلک " - شرح لمعه فصل بیع الحیوان -. و در " احیاء الموات " می گوید " هذا مع حضوره و اما مع غیبته فما کان بید الجایر یجوز المضی معه " و مرحوم فاضل تونی فورا در حاشیه نوشته است: " ای المخالف ". اختلاف نظری که صورت مشخصی به خود بگیرد و مسئله " جایر مخالف و جایر شیعه " را تحت بحث مستقیم قرار دهد (به طوری که به عنوان یکی از مسائل شناخته شده مورد اختلاف فقها مطرح گردد و بدین شکل شناخته شود) تا زمان مرحوم محقق کرکی معروف به محقق ثانی، نبود. پس از آنکه وی با حکومت صفوی مرتبط گردید و در تثبیت آن دولت کوشید مرحوم فاضل قطیفی بر علیه او بر آشفت و رفتار محقق را سخت به زیر سئوال برد و رساله (یا رساله ها) بر علیه او نوشت که محقق نیز متقابلا پاسخ میداد تا منجر به تدوین رساله " قاطعه اللجاج فی حل الخراج " به قلم محقق گشت. مرحوم کرکی در این رساله مستقیما به فاضل قطیفی پاسخ میدهد و با اسلحه استدلال سخت به وی حمله می کند. روایات باب را بررسی می کند سنت و سیره علما را از سید رضی و سید مرتضی و شیخ و... شرح میدهد. فتواها را نقل می کند. چون این رساله در پاسخ مرحوم قطیفی نوشته شده بی تردید مطابق سخنان وی پاسخ داده شده و جالب این است که سیاق کلام در این رساله نیز همان سیاق " اطلاق " است و سخنی از جایر شیعه و جایر غیر شیعه به میان نیامده. این اصل، بیانگر این است که در این در گیری اجتهادی (که شدیدترین و بیمانندترین درگیری در میان دو مجتهد متقی و دانشمند است) نیز جریان استدلال در همان صورت " مطلق " بودن است. و جالبتر اینکه محقق کرکی در این پاسخ ها به همان روند عمومی و جریان شناخته شدهء بحث در طول تاریخ فقه، اکتفاء می کند. یعنی صورت خاصی به مسئله نمیدهد مثلا نمی گوید " من حکومت صفویه را تنفیذ میکنم بنابر این حاکمیت آنها مشروع می شود ". همانطور که سید رضی نسبت به فاطمیون. و علامه حلی نسبت به سلطان محمد خدابنده. و شهید اول نسبت به سر به داران. بدون اینکه تنفیذ کنند و حکومت آنان را از چهره " جایر " در بیاورند هم کمک شان میکردند و هم تصرفات آنان را در امور مالی بیت المال (دستکم) با تصرفات جایر غیر شیعی، یکی میدانستند. پس از دیگری مذکور، مذکور مسئله جایر شیعی و جایر غیر شیعی به عنوان یک موضوع شناخته شده مطرح گردید. و باصطلاح اثری از آثار دولت صفوی است. در هر صورت، اگر مرحوم میرزا تنها به جملهء " خلاف هست " اکتفاء میکرد جای سخنی نبود زیرا نمی توان در مسئله ادعای اجماع کرد لیکن لفظ " خلاف عظیم " باری از معنی دارد که بر تردید قابل اشکال است
و مراد از مفتوح العنوه زمینی است که آن را با شمشیر و غلبه، مسلمین از کفار گرفته باشند. ولکن شرط است که فتح آن بلاد به اذن امام عادل باشد. و چون مشهور